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सभा पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
स कोटिशतसङ्ख्येन धनेन महता तदा |  २७   क
अभ्यवर्षदमेय़ात्मा धनवर्षेण पाण्डवम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति