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सभा पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो हिमवतः पार्श्वे समभ्येत्य जरद्गवम् |  ४   क
सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशे वली ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति