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वन पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्योऽथ मेधावी वुद्धिपर्येषणं चरेत् |  १८   क
अलव्धस्य च लाभाय़ लव्धस्य च विवृद्धय़े ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति