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अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
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भीष्म उवाच
वाय़ुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षय़ेत् |  ४४   क
तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति