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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्पर्धते सर्वदेवैर्यः कालोपहतचेतनः |  ६३   क
मय़ा विनाशलिङ्गानि स्वप्ने दृष्टानि तस्य वै ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति