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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
अधर्मेण जय़ं लव्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः |  १४   क
यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति