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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
सदा च तत्र पर्जन्यः सम्यग्वर्षी न संशय़ः |  १५   क
सम्पन्नसस्या च मही निरीतीका भविष्यति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति