विराट पर्व  अध्याय २७

वैशम्पाय़न उवाच

आचार्यवाक्योपरमे तद्वाक्यमभिसन्दधत् |  २   क
हितार्थं स उवाचेमां भारतीं भारतान्प्रति ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति