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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेतत्तु सञ्चिन्त्य यत्कृतं मन्यसे हितम् |  २८   क
तत्क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येवं श्रद्दधासि मे ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति