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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
तच्चेदेवं देशरूपेण पार्थाः; करिष्यध्वं कर्म पापं चिराय़ |  १६   क
निवसध्वं वर्षपूगान्वनेषु; दुःखं वासं पाण्डवा धर्महेतोः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति