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वन पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
सूर्योदय़े यस्तु समाहितः पठे; त्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चय़ान् |  ३२   क
लभेत जातिस्मरतां सदा नरः; स्मृतिं च मेधां च स विन्दते पराम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति