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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अप्रज्ञो वा पाण्डव युध्यमानो; अधर्मज्ञो वा भूतिपथाद्व्यपैति |  २१   क
प्रज्ञावान्वा वुध्यमानोऽपि धर्मं; संरम्भाद्वा सोऽपि भूतेरपैति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति