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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
लव्ध्वापीमां पृथिवीं सागरान्तां; जरामृत्यू नैव हि त्वं प्रजह्याः |  २६   क
प्रिय़ाप्रिय़े सुखदुःखे च राज; न्नेवं विद्वान्नैव युद्धं कुरुष्व ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति