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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अल्पकालं जीवितं यन्मनुष्ये; महास्रावं नित्यदुःखं चलं च |  ३   क
भूय़श्च तद्वय़सो नानुरूपं; तस्मात्पापं पाण्डव मा प्रसार्षीः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति