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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
कामा मनुष्यं प्रसजन्त एव; धर्मस्य ये विघ्नमूलं नरेन्द्र |  ४   क
पूर्वं नरस्तान्धृतिमान्विनिघ्नँ; ल्लोके प्रशंसां लभतेऽनवद्याम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति