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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
निवन्धनी ह्यर्थतृष्णेह पार्थ; तामेषतो वाध्यते धर्म एव |  ५   क
धर्मं तु यः प्रवृणीते स वुद्धः; कामे गृद्धो हीय़तेऽर्थानुरोधात् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति