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भीष्म पर्व
अध्याय २७
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श्रीभगवानु उवाच
ज्ञेय़ः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति |  ३   क
निर्द्वन्द्वो हि महावाहो सुखं वन्धात्प्रमुच्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति