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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
तपसा व्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञय़ापि च |  १६   क
सन्तो यां गतिमिच्छन्ति प्राप्तस्तां तव पुत्रकः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति