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भीष्म पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
ततो रथसहस्रेषु विद्रवत्सु ततस्ततः |  २२   क
तावास्थितावेकरथं सौभद्रशिनिपुङ्गवौ |  २२   ख
सौवलीं समरे सेनां शातय़ेतां समन्ततः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति