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द्रोण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
किं नु संशप्तकान्हन्मि स्वान्रक्षाम्यहितार्दितान् |  ५   क
इति मे त्वं मतं वेत्थ तत्र किं सुकृतं भवेत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति