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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
प्रय़ानेव तदा कर्णो हर्षय़न्वाहिनीं तव |  १   क
एकैकं समरे दृष्ट्वा पाण्डवं पर्यपृच्छत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति