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वन पर्व
अध्याय २०२
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व्याध उवाच
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति |  २०   क
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रिय़ः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति