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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
यदा दिव्यं धनुरादाय़ पार्थः; प्रभासय़न्पृतनां सव्यसाची |  ३२   क
त्वामर्दय़ेत निशितैः पृषत्कै; स्तदा पश्चात्तप्स्यसे सूतपुत्र ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति