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वन पर्व
अध्याय २५२
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द्रौपद्यु उवाच
यथा चाहं नातिचरे कथं चि; त्पतीन्महार्हान्मनसापि जातु |  २०   क
तेनाद्य सत्येन वशीकृतं त्वां; द्रष्टास्मि पार्थैः परिकृष्यमाणम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति