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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत्कृष्णौ न पश्यसि |  ४७   क
समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति