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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
यावद्गाण्डीवनिर्घोषं न शृणोषि महाहवे |  ४८   क
तावदेव त्वय़ा कर्ण शक्यं वक्तुं यथेच्छसि ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति