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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते |  ५२   क
तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभिः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति