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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
गुणान्गुणवतः शल्य गुणवान्वेत्ति नागुणः |  ५४   क
त्वं तु नित्यं गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यस्यगुणो गुणान् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति