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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् |  ५५   क
अहं शल्याभिजानामि न त्वं जानासि तत्तथा ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति