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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः |  ४८   क
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामय़ानो वराङ्गनाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति