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शान्ति पर्व
अध्याय ४९
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वासुदेव उवाच
ऊरुणा धारय़ामास कश्यपः पृथिवीं ततः |  ६४   क
निमज्जन्तीं तदा राजंस्तेनोर्वीति मही स्मृता ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति