कर्ण पर्व  अध्याय २७

सञ्जय़ उवाच

व्राह्मणैः कथिताः पूर्वं यथावद्राजसंनिधौ |  ७२   क
श्रुत्वा चैकमना मूढ क्षम वा व्रूहि वोत्तरम् ||  ७२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति