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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
मद्रकेषु विलुप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु |  ७९   क
नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेषु समाचरेत् ||  ७९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति