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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
मद्रके सङ्गतं नास्ति मद्रको हि सचापलः |  ८०   क
मद्रकेषु च दुःस्पर्शं शौचं गान्धारकेषु च ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति