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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
राजय़ाजकय़ाज्येन नष्टं दत्तं हविर्भवेत् |  ८२   क
शूद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभवम् |  ८२   ख
तथा व्रह्मद्विषो नित्यं गच्छन्तीह पराभवम् ||  ८२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति