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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
मूढांस्तु सर्वथा मन्ये धार्तराष्ट्रान्सुवालिशान् |  २२   क
पतिते शन्तनोः पुत्रे येऽकार्षुः संय़ुगं पुनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति