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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
सोऽहं प्रिय़ः सखा चास्मि धार्तराष्ट्रस्य धीमतः |  ९४   क
तदर्थे हि मम प्राणा यच्च मे विद्यते वसु ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति