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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि |  ९६   क
सङ्ग्रामाद्विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति