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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
पार्थश्च पुरुषव्याघ्रः शरैः संनतपर्वभिः |  ७८   क
जघान धार्तराष्ट्रस्य चतुर्विधवलां चमूम् ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति