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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशां पते |  ३५   क
द्विधा चिच्छेद समरे सौवलस्य हसन्निव ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति