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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः |  २३   क
नापश्यत्समरे कञ्चित्सहाय़ं रथिनां वरः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति