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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
उवाच चैनं मेधावी निगृह्य स्मारय़न्निव |  ४६   क
क्षत्रधर्मे स्थितो भूत्वा युध्यस्व पुरुषो भव ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति