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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अद्य ते विहनिष्यामि क्षुरेणोन्मथितं शिरः |  ४९   क
वृक्षात्फलमिवोद्धृत्य लगुडेन प्रमाथिना ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति