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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु क्रुद्धः सुवलस्य पुत्रो; माद्रीसुतं सहदेवं विमर्दे |  ५५   क
प्रासेन जाम्वूनदभूषणेन; जिघांसुरेकोऽभिपपात शीघ्रम् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति