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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
माद्रीसुतस्तस्य समुद्यतं तं; प्रासं सुवृत्तौ च भुजौ रणाग्रे |  ५६   क
भल्लैस्त्रिभिर्युगपत्सञ्चकर्त; ननाद चोच्चैस्तरसाजिमध्ये ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति