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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
शरेण कार्तस्वरभूषितेन; दिवाकराभेन सुसंशितेन |  ५८   क
हृतोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन; पपात भूमौ सुवलस्य पुत्रः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति