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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुताः शुष्कमुखा विसञ्ज्ञा; गाण्डीवघोषेण समाहताश्च |  ६१   क
भय़ार्दिता भग्नरथाश्वनागाः; पदातय़श्चैव सधार्तराष्ट्राः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति