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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
तं चापि सर्वे प्रतिपूजय़न्तो; हृष्टा व्रुवाणाः सहदेवमाजौ |  ६३   क
दिष्ट्या हतो नैकृतिको दुरात्मा; सहात्मजो वीर रणे त्वय़ेति ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति