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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अश्वैर्विपरिधावद्भिः शरच्छन्नैर्विशां पते |  ८   क
तत्र तत्र कृतो मार्गो विकर्षद्भिर्हतान्वहून् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति