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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
अनीतिजं यद्यविधानजं सुखं; हठप्रणीतं विविधं प्रदृश्यते |  ५०   क
न विद्यते तस्य गतिर्महीपते; र्न विद्यते राष्ट्रजमुत्तमं सुखम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति